जैविक खेती अपनाइये, भूमि की जान बचाइये, अधिक पैदावार बढ़ाकर, खेती की लागत घटाइये
राजगढ़ - जैविक खेती का अर्थ वह कृषि पद्धति है जिसमें रासायनिक खादों एवं दवाओं के स्थान पर देशी तरीकों, गोबर, कूड़ा- कचरा एवं वानस्पतिक पदार्थों से बनी चीजों के प्रयोग से खेती की जा सकती है। आज के समय में रासायनिक खादों एवं दवाओं के प्रयोग से खेती करना महंगा तो है ही साथ ही उससे जमीन भी खराब हो रही है। इस तरह पैदा अन्न, फल-सब्जी खाकर मनुष्यों में कई बीमारियां फैल रही है। अतः जैविक तरीके अपनाने से भूमि सुधार हो तो होगा ही साथ में नाममात्र के खर्च पर खेती पर होने वाला खर्च बचाकर बहुत सारा लाभ प्राप्त किया जा सकेगा।
प्रमुख जैविक हरी खाद से कुछ वर्षों पहले किसान बंधु सनई, ढेचा, उड़द आदि फसल बोकर फल आने पर खेत में काट कर बिखेर देते थे। जिससे बहुत अच्छी खाद फसलों को मिलती थी एवं खेती भी सुधरती थी। आज फिर इसकी जरूरत है। अतः किसान भाई हरी खाद का अवश्य प्रयोग करें।
प्रमुख जैविक हरी खाद से कुछ वर्षों पहले किसान बंधु सनई, ढेचा, उड़द आदि फसल बोकर फल आने पर खेत में काट कर बिखेर देते थे। जिससे बहुत अच्छी खाद फसलों को मिलती थी एवं खेती भी सुधरती थी। आज फिर इसकी जरूरत है। अतः किसान भाई हरी खाद का अवश्य प्रयोग करें।
मुर्गी खाद
मुर्गी की बीट खाद के रूप में बहुत प्रयोग की जाने लगी है। जिससे भूमि सुधारकर पैदावार बढ़ती है। इसे 10-15 क्विंटल प्रति बीघा डाले।
जीवाणु कल्चर खाद
यह अति सूक्ष्म जीवाणु का समूह खाद के रूप में होता है। इससे पैदावार बढ़ने के साथ भूमि की उर्वरा शक्ति बढती है। राइजोबियम, पी.एस.बी., एजेक्टोबैक्टर जीवाणु कल्चर प्रमुख है। जिन्हे बोनी के समय बीच में प्रतिकिलो 3 ग्राम मिलाकर या बोनी के बाद 1 पैकेट राइजोबियम कल्चर (सोयाबीन) या एजेक्टोबैक्टर (ज्वार, मक्का हेतु) 1 पैकेट पी.एस.बी कल्चर, 4 तगाड़ी मिट्टी, 4 तगाड़ी गोबर खाद मिलाकर छिड़काव करें।
केंचुआ खाद
केंचुआ किसान का परममित्र है जो जमीन की उर्वरा शक्ति को बनाकर रखता है। वर्मी कल्चर विधि से 5×20×15 फीट जगह में 2 माह में 6 से 8 क्विंटल एवं वर्ष में 60 क्विंटल खाद बनाई जा सकती है प्रतिवर्ष हजारों रूपये केंचुआ बेचने से कमाए जा सकते है। केंचुए धोने से प्राप्त पानी टानिक का काम करता है।
जैविक विधियों से कीड़े एवं रोगों की रोकथाम के उपाय
वर्तमान में फसलों में कीड़े एवं रोगों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। जिससे किसान को महंगी दवाईयां डालनी पड़ती है। इनसे एक ओर जहां भूमि के मित्र कीट व पक्षी नष्ट हो रहे है वही दूसरी ओर उपज से अनाज, सब्जी, दलहन, तिलहन खाकर मनुष्य एवं पशुओं के शरीर पर बीमारी आलस्य आदि दुष्परिणाम दिखाई दे रहे है। अतः कम खर्च व घर में उपलब्ध सामग्री द्वारा तैयार की गई विधियों को अपनाकर स्वस्थ्य एवं हानि रहित फसल प्राप्त हो सकेगी।
गौमूत्र
गौमूत्र को कांच की बॉटल में भरकर रख सकते है। एक स्प्रेयर पंप के पानी में 200 मि.ग्रा. गौमूत्र फसल बुआई के 15 दिन बाद से प्रति 10 दिन में छिड़काव करने से फसलों में किट रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो जाती है।
नीम
नीम की 15-20 किलों पत्तियों को 1 ड्रम में 4 दिन तक भिगोकर छांव में रखे। हरे पीले पानी में इतना पानी मिलायें की उसमें झाग आ जाए। इसे पंप में भरकर छिड़काव करें।
छाछ का प्रयोग
एक मटके में छाछ भरकर उसे प्लास्टिक से मुंह बांधकर 1 माह (अधिक दिन भी) के लिए रख दें। इसके उपरांत 1 पंप में 250 ग्राम की दर से डाल के स्प्रे करे। इससे इल्ली व अन्य कीट रोग की रोक होगी।
बेशरम पत्ती
यह बहुत जहरीली होती है। दो किलो पत्ती को 5 लीटर पानी में उबाले। आधा रहने पर ठंडा कर प्रति पंप 1 गिलास डालकर छिड़कें।
तम्बाकू पत्ती
आधा किलो तम्बाकू पत्ती या डंठल 5 लीटर पानी में उबाले। आधा रहने पर ठंडा कर प्रति पंप 1 गिलास की दर से प्रति एकड़ छिड़के।
मिर्ची-लहसुन
आधा किलो हरी मिर्च एवं आधा किलो लहसुन पीसकर चटनी बनाएं। इसे पानी में घोलकर छान ले। इसमें 100 लीटर पानी एवं 100 ग्राम वाशिंग पावडर मिलाएं। प्रति पंप 1 गिलास मिलाकर छिड़के।
हींग का प्रयोग
खेतों में दीमक (ऊदी) की रोकथाम हेतु 200 ग्राम हींग की पोटली बनाकर खेत में पानी के पाइप के पास लकड़ी से बांधकर पानी में डाल दें। वह घुलकर जमीन में पहुंचेगी तथा दीमक को नष्ट कर देगी।
लकड़ी की राख
दस किलो में 100 मि.ग्रा. मिट्टी का तेल मिलाकर भुरकने से माहो पर नियंत्रण होता है।
अंतरवर्तीय खेती
खेत में एक फसल की कतारों के बाद दूसरी फसल की कतार लगाने से कीट रोग आगे नही फैल पाते हैं। जैसे सोयाबीन की 4 कतार और 2 कतार मक्का अथवा ज्वार या अरहर की लगाएं।
प्रकाश प्रपंच
रात्रि को खेत में बल्ब जलाकर उस पर तेल वाला कागज या चमकीला पत्रा लगायें। नीचे तगाड़ी में थोड़ा मिट्टी का तेल मिलाकर पानी भरें। जिससे आकर्षित होकर उड़ने वाले कीड़े आकर टकराने से पानी में गिरकर नष्ट हो जाएंगे।
लकड़िया गाड़ना
खेत में फसल में थोड़ी ऊंचें आकार की बबूल की लकड़ियां गाड़े। जिस पर बैठकर पक्षी-कीड़े को खा जाते है। एक पक्षी एक दिन में अपने वजन बराबर कीड़े खाता है।
एन.पी. वायरस
यह घोल इल्लियों से ही बनाया जाता है। इसके छिड़काव से इल्लियां बीमार होकर मर जाती है। जिन्हे इकट्ठा कर पीसकर घोल बनाकर फसलों पर पुनः छिड़काव करते रहते हैं।
टॉनिक
बायवडिंग पीसकर 1 किलो, 10 लीटर पानी में 3-4 दिन तक भिगोये, मसलकर छान लें। इसमें 10 लीटर गौमूत्र मिला ले। प्रति पंप 10 मि.ग्रा. मिलाकर फसल पर छिड़काव करें।
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