बुजुर्ग को मिला अपना घर, विदाई पर छलके आंसू - वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्ग को लेने आए बेटे-बहू
देवास -- बेटा, क्या तू भूल गया कि जब तू छोटा था और स्कूल में मस्ती करते हुए गिर जाता था तो मैं तुझे लेने आता था। तेरी हर गलती को माफ करता था। तेरे सुख के लिए अपने सुख दांव पर लगा देता थ। आज जब मैं बूढ़ा हो गया तो तुम सबको परेशानी होने लगी। आंसुओं में भीगे ये शब्द थे उस वृद्ध पिता के जो अपने घर से दूर वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर था। उसके बेटे-बहू जब उसे वापस लेने आए तो सबकी आंखे छलक गई और आखिर में दोनों बेटे पिता को साथ लेकर गए। एक बेटे ने मां को अपने साथ रखा तो दूसरे ने पिता को। यह भरोसा दिलाया कि अब कोई गलतफमी नहीं होगी। राजी खुशी रहेंगे।
ग्राम कानकुंड निवासी तुलसीराम कारपेंटर उम्र 82 वर्ष दिनांक 19 अप्रैल 2018 को वृद्धाश्रम में रहने आए थे। उन्होंने एसडीएम पुरूषोत्तम कुमार से गुहार लगाई थी, जिसके बाद उन्हें वृद्धाश्रम में प्रवेश दिया गया। वृद्धाश्रम प्रबंधक लगातार उनके बेटों से संपर्क कर रहे थे। शनिवार को दोनों बेटे अपनी मां और पत्नी के साथ वृद्धाश्रम आए। दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक काउंसलिंग हुई। माता-पिता के साथ बेटे-बहुओं की बात सुनी। आखिर में तय हुआ कि एक बेटा मां को अपने साथ रखेगा और दूसरा बेटा पिता को। इसके बाद दोनों बेटे माता-पिता को लेकर राजीखुशी घर गए।
छलक गई सभी की आंखे
जब घर जाने की बारी आई तो बुजुर्ग तुलसीराम की आंखों में आंसू आ गए और वे वृद्धाश्रम प्रबंधक के सीने से लगकर रोने लगे। यह नजारा देख बेटे भी भावुक हो उठे। वृद्धाश्रम के अन्य बुजुर्गों की आंखे भी यह दृश्य देख भर आई। पिता ने भी बेटों से यही कहा कि जब तुम छोटे थे तब मैंने कितना कुछ किया। तुम्हारे सुख चैन के लिए सब कुछ न्यौछावर किया और आज जब मैं बूढ़ा हो गया तो मेरे साथ ऐसा हो रहा है।
अब तक 140 बुजुर्गों को जोड़ा परिवार से
प्रबंधक दिनेश चौधरी ने बताया कि हमारी कोशिश यही रहती है कि किसी को भी यहां न आना पड़े। अपने घरवालों के साथ ही जीवन बिताएं, लेकिन कई बार विपरीत परिस्थितियों के चलते बुजुर्गों को यहां आना पड़ता है। वृद्धाश्रम में फिलहाल 47 बुजुर्ग निवासरत हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 से 2018 तक 140 वृद्धों को उनके परिवार से जोड़ा है। कुछ से लगातार बातें भी होती है। वे कहते हैं कि अब किसी तरह की परेशानी नहीं है। बेटे बहू सब अच्छे से रखते हैं। बेटों को यही समझाया कि जब पिता ने बचपन में तुम्हारे लिए इतनी परेशानी उठाई तो थोड़ा तुम भी कष्ट उठा सकते हों। माता-पिता कैसे भी हो उनकी सेवा हमेशा सबसे बड़ा कर्तव्य हैं। उन्होंने समझाते हुए कहा कि बचपन में जब हमारी गलतियों पर वे हमें घर से नहीं निकालते तो उनके उनके बूढ़े होने पर हम उन्हें कैसे निकाल सकते हैं। बुढ़ापा तो सभी को आना है।
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