दिव्यांगों के कृत्रिम पैर का सहारा बना न्याज अली "कहानी सच्ची है"
छिन्दवाड़ा नगर के दिव्यांग श्री न्याज अली ने अपने जैसे ही अन्य दिव्यांगों को कृत्रिम पैर प्रदान कर उनका जीवन आसान करके समाज में एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। जब कोई दिव्यांग उनके बनाये उपकरणों के माध्यम से चलने लगता है, तब उन्हें बहुत प्रसन्नता होती है। अभी तक वे लगभग 500 कृत्रिम पैर बनाकर दिव्यांगों को प्रदान कर चुके हैं तथा जिन दिव्यांगों को कृत्रिम पैर मिले है वे कृत्रिम पैरों का नया सहारा पाकर अत्यंत प्रसन्न है।
छिन्दवाड़ा नगर के श्री न्याज अली पहले ट्रक चलाया करते थे। वर्ष 1992 में एक दुर्घटना के कारण उनके बायें पैर को काटना पड़ा और उन्हें 80 प्रतिशत दिव्यांगता का दंश झेलना पड़ा। दिव्यांग होने के बाद उनके मन में दिव्यांगता को परास्त करने की लालसा जन्म ले चुकी थी और वे इस संबंध में निरंतर सोचते रहते थे। उन्हें जयपुर में कृत्रिम पैर बनाकर लगवाने की जानकारी मिली तो वे तुरंत ही जयपुर पहुंचे और उन्होंने अपना कृत्रिम पैर बनवाकर लगवाया। उन्हें कृत्रिम पैर का सहारा मिल जाने से उनके मन में अन्य दिव्यांगजनों के दुख दर्द को दूर करने की इच्छा जागृत हुई और उन्होंने एक नया संकल्प लेकर जयपुर में ही कृत्रिम पैर व कैलिपर्स बनाने का प्रशिक्षण लिया और प्रशिक्षित होकर वर्ष 2004 से जिला विकलांग पुनर्वास केंद्र में सहायक टेक्नीशियन के रूप में अपनी सेवाये दे रहे है। वर्ष 2004 से अभी तक वे लगभग 500 दिव्यांगों को कृत्रिम पैर का सहारा देकर उनके जीवन में खुशियों की बहार ला चुके है। श्री न्याज अली ने बताया कि अभी हाल ही में श्री कलीराम उईके नाम के व्यक्ति के बायें पैर में एक वर्ष पूर्व गेंगरीन हो गया था जिसके कारण जिला अस्पताल छिन्दवाड़ा में ऑपरेशन के द्वारा उसके पैर को काटकर अलग कर दिया गया और उसे चलने-फिरने में बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। ऑपरेशन के कुछ महीने बाद श्री कलीराम उईके को जिला विकलांग पुनर्वास केंद्र के बारे में पता चला तो वे किसी तरह इस केन्द्र में आये और यहां उनका मुझसे संपर्क हुआ। मैने श्री उईके को कृत्रिम पैर बनाकर दिया और उसे चलने-फिरने का प्रशिक्षण भी दिया जिससे उसे चलने में आसानी हुई। अब श्री कलीराम उईके कृत्रिम पैर पाकर आसानी से कहीं भी आ जा सकता है। अब वह किसी पर निर्भर नहीं है। अपना काम स्वयं कर सकता है और खुश है। श्री न्याज अली कहते है कि दिव्यांग इस केन्द्र से जहां कृत्रिम पैर पाकर प्रसन्न होते है, वहीं असहाय दिव्यांगों की सहायता करने पर मुझे भी प्रसन्नता का अनुभव होता है।
छिन्दवाड़ा नगर के श्री न्याज अली पहले ट्रक चलाया करते थे। वर्ष 1992 में एक दुर्घटना के कारण उनके बायें पैर को काटना पड़ा और उन्हें 80 प्रतिशत दिव्यांगता का दंश झेलना पड़ा। दिव्यांग होने के बाद उनके मन में दिव्यांगता को परास्त करने की लालसा जन्म ले चुकी थी और वे इस संबंध में निरंतर सोचते रहते थे। उन्हें जयपुर में कृत्रिम पैर बनाकर लगवाने की जानकारी मिली तो वे तुरंत ही जयपुर पहुंचे और उन्होंने अपना कृत्रिम पैर बनवाकर लगवाया। उन्हें कृत्रिम पैर का सहारा मिल जाने से उनके मन में अन्य दिव्यांगजनों के दुख दर्द को दूर करने की इच्छा जागृत हुई और उन्होंने एक नया संकल्प लेकर जयपुर में ही कृत्रिम पैर व कैलिपर्स बनाने का प्रशिक्षण लिया और प्रशिक्षित होकर वर्ष 2004 से जिला विकलांग पुनर्वास केंद्र में सहायक टेक्नीशियन के रूप में अपनी सेवाये दे रहे है। वर्ष 2004 से अभी तक वे लगभग 500 दिव्यांगों को कृत्रिम पैर का सहारा देकर उनके जीवन में खुशियों की बहार ला चुके है। श्री न्याज अली ने बताया कि अभी हाल ही में श्री कलीराम उईके नाम के व्यक्ति के बायें पैर में एक वर्ष पूर्व गेंगरीन हो गया था जिसके कारण जिला अस्पताल छिन्दवाड़ा में ऑपरेशन के द्वारा उसके पैर को काटकर अलग कर दिया गया और उसे चलने-फिरने में बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। ऑपरेशन के कुछ महीने बाद श्री कलीराम उईके को जिला विकलांग पुनर्वास केंद्र के बारे में पता चला तो वे किसी तरह इस केन्द्र में आये और यहां उनका मुझसे संपर्क हुआ। मैने श्री उईके को कृत्रिम पैर बनाकर दिया और उसे चलने-फिरने का प्रशिक्षण भी दिया जिससे उसे चलने में आसानी हुई। अब श्री कलीराम उईके कृत्रिम पैर पाकर आसानी से कहीं भी आ जा सकता है। अब वह किसी पर निर्भर नहीं है। अपना काम स्वयं कर सकता है और खुश है। श्री न्याज अली कहते है कि दिव्यांग इस केन्द्र से जहां कृत्रिम पैर पाकर प्रसन्न होते है, वहीं असहाय दिव्यांगों की सहायता करने पर मुझे भी प्रसन्नता का अनुभव होता है।
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